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कैसे गरीबों और पिछड़ों के मसीहा लालू धंस गए भ्रष्टाचार के दलदल में

कैसे गरीबों और पिछड़ों के मसीहा लालू धंस गए भ्रष्टाचार के दलदल में
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में लालू यादव की की शुरुआती छवि गरीबों और पिछड़ों के मसीहा की रही है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भ्रष्टाचार में उन्होंने अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया है। 
वह ऐसे पहले शख्स राजनेता हैं जिनको भ्रष्टाचार के मामले में 5 साल की जेल की सजा के कारण 15वीं लोकसभा की सदस्यता गंवानी पड़ी थी। उन्हें 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले के लिए दोषी माना गया था। उन्हें पांच साल जेल काटने की सजा सुनाई जा चुकी है, इस समय वह जमानत पर बाहर हैं।
 
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव मंगलवार को फिर खबरों में आए जब उनके घर समेत 22 ठिकानों पर आयकर का छापा पड़ा। बताया जा रहा है छापे बेनामी संपत्ति के मामले में मारे गये हैं। लालू यादव के अलावा उनकी पार्टी के सांसद प्रेमचंद गुप्ता के बेटों के घरों पर भी छापे मारे गए।
 
बताया जा रहा है कि आयकर विभाग लालू यादव और उनके परिवार के द्वारा किए लगभग 1000 करोड़ के बेनामी लेनदेन की जांच कर रहा है। इन छापों के साथ ही लालू से जुड़ा एक और भ्रष्टाचार का मामला सामने आया।
लालू पर घोटालों के बेशुमार आरोप हैं। उन पर आरोप है कि पद का दुरुपयोग कर अपनी पत्नी, बेटी, बेटे सबके नाम पर दिल्ली, पटना, रांची और दूसरे शहरों में करोड़ों की संपत्ति बटोरी गई है। लेकिन इन सबके बारे में चुनाव के दौरान कुछ बताया भी नहीं गया।
 
लालू यादव ने कॉलेज से ही अपनी राजनीति की शुरुआत छात्र नेता के तौर पर की। इसी दौरान वो जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए आंदोलन का हिस्साु बन गए। जयप्रकाश नारायण, राजनारायण, कर्पूरी ठाकुर और सतेंद्र नारायण सिन्हा  जैसे राजनेताओं से मिलकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की।
 
महज 29 साल की उम्र में 1977 में लालू यादव पहली बार संसद पहुंचे। अपनी जनसभाओं में लालू 1974 की संपूर्ण क्रांति का नारा दोहराते रहे। लालू प्रसाद 10 मार्च 1990 को पहली बार बिहार के मुख्यकमंत्री बने। फिर 1995 में दूसरी बार राज्य के मुख्य1मंत्री बने। 1997 में लालू प्रसाद जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल पार्टी बनाकर उसके अध्य क्ष बने।
 
2004 के लोकसभा चुनाव में वो बिहार की छपरा संसदीय सीट से जीतकर केंद्र में यूपीए शासनकाल में रेल मंत्री बने. लालू ने समय-समय पर किंग मेकर की भूमिका भी निभाई. लेकिन अगले ही साल 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी की सरकार हार गई। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो उनकी पार्टी के केवल चार उम्मीदवार ही जीतकर संसद पहुंचे।
 
बिहार में लालू यादव का राज पूरे 15 साल तक रहा। तमाम आलोचक उनके कार्यकाल को जंगलराज की श्रेणी में रखते हैं। अपराध, भ्रष्टाचार, अराजकता बिहार की पहचान बताए जाने लगे। अपहरण और फिरौती का एक पूरा उद्योग खड़ा हो गया।
चारा घोटाला मामले में 1997 में जब सीबीआई ने उनके खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया तो लालू को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा. पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता सौंपकर वो आरजेडी के अध्यक्ष बन गये और अपरोक्ष रूप से सत्ता की कमान अपने हाथ में रखी। लगभग 17 साल तक चले इस ऐतिहासिक मुकदमे में 3 अक्टूबर 2013 को 5 साल की कैद और 25 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई. इस मामले में रांची की सीबीआई अदालत ने लालू को 5 साल कैद की सजा सुनाई थी।
लालू और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता जगदीश शर्मा को घोटाले मामले में दोषी करार दिये जाने के बाद लोकसभा से अयोग्य ठहराया गया। इसके बाद रांची जेल में सजा काट रहे लालू यादव की लोकसभा की सदस्यता समाप्त कर दी गई।
चुनाव के नए नियमों के अनुसार लालू अब 11 साल तक लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।
लालू प्रसाद यादव भले ही सक्रिय राजनीति से हट गए हैं लेकिन परोक्ष रूप से वो बिहार की नीतीश सरकार को प्रभावित कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के पक्ष में जमकर प्रचार किया, और तो और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए वो अभी से बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन में अपनी भूमिका को किंग मेकर वाली मानते हैं।
नब्बे के दशक में बिहार में जाति की राजनीति चरम पर थी। लालू ने पिछड़ों की आवाज उठाई तो पिछड़ों और गरीब तबके के लोगों ने लालू में राबिनहुड देखा. लालू यादव को सामाजिक न्याय के पैरोकार के रूप में जाना जाने लगा। जब लालू राजनीति में आए तो उनके साथ काफी उम्मीदें जुड़ी थीं लेकिन वो उम्मीदें पूरी नहीं हुई।
लालू पर लगातार नए-नए भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे. बिहार में उनके राज में अपराध का आंकड़ा बढ़ता रहा। लोगों को उम्मीद थी कि गरीबी से निकला एक नेता ही गरीबों की बात सुनेगा पर ऐसा कुछ हुआ नहीं।
सामाजिक न्याय की लड़ाई का दावा करने वाले लालू के लिए राजनीति व्यक्तिगत और पारिवारिक महत्वाकांक्षा का माध्यम बन गई. अपराध के जरिए पैसा कमाया जाने लगा।
 
अपराध की बात करें तो हाल ही में एक चैनल ने उनके और जेल में बंद माफिया डॉन मो. शहाबुद्दीन के बीच कथित तौर पर एक साल पहले फोन पर हुई बातचीत की एक रिकॉर्डिंग प्रसारित की थी। इसमें शहाबुद्दीन को कई तरह की मांगें करते हुए सुना जा सकता है। हालांकि इस रिकॉर्डिंग की विश्वसनीयता की अभी तक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे लालू यादव पर सवालिया निशान तो आ ही गया। शहाबुद्दीन उनकी ही पार्टी के सांसद भी रहे हैं और अपराध के गंभीर मामलों में कई साल से जेल में हैं। लालू यादव पर अपराध को संरक्षण देने का आरोप भी काफी पुराना है। इसके अलावा उन पर भ्रष्टाचार का आरोप भी लगातार लगता रहा है।
जानकारों का मानना है कि लालू साम, दाम, दंड, भेद किसी भी तरह धन कमाने को बुरा नहीं मानते। और यही तरीका उन्होंने विरासत में अपने बच्चों को दिया।
 
साभार- फस्टपोस्ट
 
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