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जानें क्यों सपा-बसपा और भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी और मजबूती है मध्य यूपी

जानें क्यों सपा-बसपा और भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी और मजबूती है मध्य यूपी
लखनऊ। चुनावी सियासत के तमाम चटख रंग, रणनीति के चोले से झांकती कूटनीति, पारिवारिक झगड़े के घात-प्रतिघात और हर दर्जे का रोमांच देखना हो तो मध्य उत्तर प्रदेश के 21 जिलों की 24 लोकसभा सीटों से बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। देश के दो सबसे बड़े सियासी परिवार इसी रणक्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा बचाने का संघर्ष करते मिलेंगे तो यहीं पर राम मंदिर आंदोलन की केंद्र-भूमि अयोध्या में भाजपा अपने सांस्कृतिक एजेंडे की रखवाली करती दिखेगी।
 
पहली नजर में मध्य उत्तरप्रदेश विपक्ष का गढ़ प्रतीत होता है। यद्यपि इसी अंचल में राहुल गांधी, डिंपल यादव, जितिन प्रसाद, नकुल दुबे और संजय सिंह जैसे कद्दावर उम्मीदवारों को भाजपा के चक्रव्यूह में उलझेदेखा जा सकता है। पश्चिम और बृज से मध्य उत्तर प्रदेश में प्रवेश करते ही यादवी गढ़ के प्रवेशद्वार मैनपुरी में खुद मुलायम सिंह यादव चुनावी अखाड़े में मोर्चा लिए मिलते हैं। जातिवादी राजनीति की कड़वी सच्चाई का नमूना मैनपुरी को मुलायम सिंह का अभेद्य गढ़ माना जाता है। इससे सटी फिरोजाबाद सीट पर यादव परिवार की अंतर्कलह चुनाव मैदान में उतर पड़ी है। यहां मुलायम सिंह के अनुज शिवपाल सिंह अपनी नई पार्टी प्रसपा के बैनर पर रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव को पटखनी देने के लिए वही चरखा दांव आजमा रहे हैं जो मुलायम सिंह ने उन्हें विरोधियों से निपटने के लिए सिखाया था। 
 
मैनपुरी के दूसरे सिरे पर कन्नौज सीट है, जहां अखिलेश यादव की पत्नी व मौजूदा सांसद डिंपल यादव अपनी सीट और परिवार, खासकर अखिलेश की प्रतिष्ठा बचाने के लिए जूझ रही हैं। फर्रुखाबाद, इटावा और अकबरपुर सीटों का चुनाव भले ही उतना ग्लैमरस नहीं है, पर खालिस राजनीतिक शैली में हो रहे चुनाव में भाजपा को यहां सपा-बसपा गठबंधन से कड़ी चुनौती मिल रही है। कानपुर नगर सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस प्रत्याशी श्रीप्रकाश जायसवाल का मुकाबला भाजपा प्रत्याशी सत्यदेव पचौरी से हो रहा है। अनुभवी सियासी पंडित भी इस सीट के नतीजे का पूर्वानुमान करने में संकोच कर रहे हैं। फतेहपुर और उन्नाव में भी दिलचस्प मुकाबले हो रहे हैं।
 
यद्यपि वीवीआइपी सीट लखनऊ का चुनावी पारा केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के मैदान में होने की वजह से बहुत चढ़ा हुआ है। इस सीट पर सपा ने फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा, जबकि कांग्रेस ने आचार्य प्रमोद कृष्णन को मैदान में उतारा है। उनके कद का एक भी प्रत्याशी सामने न होने से राजनाथ सिंह की टीम निश्चिंत दिखती है, पर एक और हाई प्रोफाइल सीट अमेठी के हालात ऐसे नहीं हैं। 2014 में ऐन मौके पर चुनाव लड़ने अमेठी पहुंचीं स्मृति ईरानी ने सिर्फ एक लाख वोटों से पिछड़कर राहुल गांधी को सकते में डाल दिया था। स्मृति पिछले पांच साल बराबर अमेठी आती-जाती रहीं। अब वह फिर राहुल से मुकाबिल हैं तो कांग्रेसी खेमे का चिंतित होना लाजिमी है। राहुल गांधी ने केरल की वायनाड सीट पर भी नामांकन करविरोधियों को यह कहने का मौका दे दिया कि वह अमेठी में आत्मविश्वास खो चुके हैं।
 
यदि प्रियंका वाड्रा वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने चुनाव न लड़ीं तो इस लोकसभा चुनाव का सर्वाधिक रोमांचकारी मुकाबला अमेठी में होना तय है। अमेठी के अगल-बगल रायबरेली और सुल्तानपुर सीटों पर जेठानी-देवरानी (क्रमश : सोनिया गांधी और मेनका गांधी) मैदान में हैं। मेनका गांधी भाजपा की उम्मीदवार हैं। इसलिए कांग्रेस उनकी राह में सारे रोड़े बिछाएगी। कांग्रेस ने यहां रजवाड़ा पृष्ठभूमि के दिग्गज नेता संजय सिंह को टिकट दिया है। इस सीट पर भी अमेठी और रायबरेली के ही तर्ज पर ताकत झोंकी जा रही है। यहां प्रियंका की लोकप्रियता एवं राजनीतिक कौशल का भी इम्तिहान होना है। वह भले ही यहां मैदान में नहीं हैं, इसके बावजूद लोग उनकी अधिक चर्चा करते हैं।
 
फैजाबाद भाजपा के लिए बहुत खास है। राम मंदिर आंदोलन की इस केंद्र-भूमि पर पराजय का संदेश भाजपा अच्छी तरह समझती है। लिहाजा मौजूदा सांसद लल्लू सिंह के पीछे भाजपा और संघ परिवार की पूरी ताकत खड़ी है। अंबेडकर नगर, बहराइच, श्रावस्ती, सीतापुर, हरदोई, खीरी और धौरहरा में भी दिलचस्प मुकाबले हो रहे हैं। खासकर धौरहरा में, जहां पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद कांग्रेस उम्मीदवार हैं। उनके मुकाबले अन्य मजबूत उम्मीदवारों के अलावा पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह भी मैदान में हैं जिन्हें शिवपाल सिंह ने अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी बनाया है।
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